Wednesday, 21 July 2010

संकेत दिया था शायद तुमने.

संकेत दिया था शायद तुमने !

जीवन के हर पथ पर तुमने , हार कभी नही मानी थी,
झुके नही थे कभी कहीं, तर्क प्रबुद्ध अपने मनवाए थे ।
व्यक्तित्व कभी लाचार न देखा, न चेहरा मायूस ही था,
चिंता थी कोई मन में , किन्तु उस का प्रचार न था ।
20 दिन पहले जब, मैने छुए थे चरण तुम्हारे,
मेरे भविष्य की चिंता में, तुम्हारे सुखद उद्गार ही थे।
जिस को हम न समज सके, वो संकेत दिया था शायद तुमने
हम सब इतने नादां निकले , न भांप सके दर्द तुम्हारा ।
अंत समय की तुम्हारी कुछ बाते, तडपा रही हैं मानस मेरा,
स्वाति, वैभव {विभा जी महारज} की यादो में ,कोन सा था मर्म छुपा ।
वो न कर सका मैं , कर सकता था जिसे सहज !
शायद कुछ दिन रह पाते संग , गर हो पाता उपाय वेसा।
अब तो सोच ही सोच है बाकि, और है अश्रुओं का अम्बार,
अब तो बस पछतावा हैं , कुछ यादों का साया हैं,
जिन्हें समेटे रखेगे हम सब , जब तक जीवन हमारा भी हैं।
अनुज
अमृत कुमार शर्मा